Thursday, April 29, 2021

कोरोना... एक प्रलय ही तो है...

हमने कभी प्रलय नहीं देखी थी

नहीं देखे थे ऐसे डरावने मंजर

शवों की ऐसी दुर्गति नहीं देखी थी

लंबी लाइनें तो बहुत देखी थीं लेकिन

लाशों की इतनी लंबी-लंबी लाइनें नहीं देखी थीं

सिस्टम का ऐसा व्यवहार नहीं देखा था

इंसान को इतना लाचार नहीं देखा था

नहीं झेला था कभी श्मशान का इतना धुआं

इतनी कब्रें, इतनी चिताएं... फिर भी श्मशान पर इंतजार नहीं झेला था

कोरोना ने इन सबसे एक झटके में रू-ब-रू करा दिया

कोरोना... एक प्रलय ही तो है...

फिर भी एक उम्मीद है कि...

जल्द छंटेगा ये दर्द का कुहांसा

थमेंगी लोगों की चित्कार

खत्म होगी ये जद्दोजहद

खत्म होगा ये लंबा इंतजार...

टेस्ट के लिए...

रिपोर्ट के लिए...

भर्ती के लिए...

दवा के लिए...

इंजेक्शन के लिए...

ऑक्सीजन के लिए...

प्लाज्मा के लिए...

और अंत में अंतिम संस्कार के लिए...

Wednesday, August 12, 2015

यह कैसी आजादी???



भारत देश अपना 68वां स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रहा है। 15 अगस्त 1947 को हमारा देश अंग्रेजों की हुकूमत से आजाद हुआ था, लेकिन इन दिनों जब भी मैं कहीं बाहर निकलता हूं एक सवाल मेरे दिल और दिमाग पर हावी हो जाता है, यह कैसी आजादी???

अगस्त का महीना आते ही पूरे भारत में सुरक्षा बल सक्रिय हो जाते हैं, जगह-जगह चेकिंग होने लगती है। लोगों से गुजारिश की जाती है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें, स्वतंत्रता दिवस पर संयम बरतें।
काहे भाई, काहे न मनाएं जश्न, काहे न करें गैदरिंग, काहे न करें हो-हल्ला, ये हमारा स्वतंत्रता दिवस है यानि हमारी आजादी का प्रतीक। आखिर, यह डर क्यों है??? कहा जाता है कि, भारत एक शक्तिशाली, युवा और तेजी से आगे बढ़ता देश है तो फिर यह डर कैसा है जो हमें स्वतंत्रता दिवस पर आजादी से कहीं भी घूमने पर रोकने की कोशिश करता है???
अगर हम सच में आजाद हैं, तो हमारी सरकार को यह डर भी खत्म करना चाहिए, ताकि देश का हर नागरिक तिरंगा लेकर अपनी आजादी का जश्न मना सके!!!


Saturday, September 29, 2012

वो चली दो कदम थी मेरे लिए...


वो चली दो कदम थी मेरे लिए... ये क्या काफी न था

साथ न सही जिंदगी भर का... दो पल का भी साथ कोई कम नहीं होता...

होता अगर मुकद्दर में साथ उसका... तो आज उसका कोई और हमराज न होता...

मुझे, उससे गिला नहीं मेरे मालिक...

गिला खुद से है कि मैं उसके काबिल न बन सका....

कमाने को तो दो-चार रोटी भर का कमा लेता है हर कोई...

कमा मैं भी लेता...

अब किससे गिला करूं, किसको सुनाऊं, किससे रोऊं

जब वो ही चला गया...

जो मुझको चुप करा लेता...

Sunday, September 23, 2012

पेड़

वो पेड़ जो फल देता था कभी
घर में चूल्हा जलाने की खातिर कट गया अभी-अभी
क्यूंकि... फलों से पेट नहीं भरता था बच्चों का
औप उनके खेलने के लिए जगह भी चाहिए थी
अब बच्चे नहीं रोयेंगे भूखे
और न ही जागेंगे रात भर...

पर क्या उन्हें वो ठंडी छांव नसीब होगी
क्या वो फिर लुका-छिपी का खेल-खेल पाएंगे।
जब घर में मां डांटती थी तो उसकी ही गोद बहलाया करती थी
अब उसे मजबूरन मन बहलाने बाजार जाना पड़ेगा
वहां जाकर दुनिया से दो-चार होना पड़ेगा।

दुनिया तो बाजार से भरी पड़ी है
वो भी खरीददार बन जाएगा
और जब खरीदते-खाते बीमार हो जाएगा
फिर वही फल बाजार से खरीद कर खाएगा
जो पहले उसके आंगन में पैदा हुआ करते थे।।

Tuesday, September 4, 2012

न होता विज्ञापन तो क्या होता...

न होता विज्ञापन तो क्या होता...

न हाथ में पेस्ट होता 

न खाने में टेस्ट होता

और न बालों में महकता तेल होता...

न होता विज्ञापन तो क्या होता...


इसिलए तो कहते हैं यारों..
.
एड चाहे पेस्ट का हो तेल का

वो चाहे फ्रिज का हो या एसी, कूलर का...

हर एक एड जरूरी होता है....

Monday, July 30, 2012

लाशों का जंगल और मैं...


लाशों के इस जंगल में 
एक लाश मेरी भी थी और उसकी भी...

बड़ी खुशहाल थी ये दुनिया
उस 'सुनामी' से पहले
जो आज बंजर हो चली

यहां भी होती थी होली और दीवाली
और जमकर मनाई जाती थी ईद
पर एक तूफान आया और
सब खतम...

बचा तो बस
लाशों का ढेर
मातम का शोर
दूर तक पसरा मौत का सन्नाटा
और...
कुछ जिंदा लाशें

जो मर गए वो तो जिंदा हो गए कहीं
जो जिंदा बचे वो मर गए 
हमेशा... हमेशा के लिए

अब न कोई दु:ख है न कोई चिंता
बस...
अपनी लाश का भारी बोझ
खुद ढोए जा रहे हैं वो लोग
अपने आखिरी सफर पर 
खुद चले जा रहे हैं... वो लोग

और वो आखिरी सफर..
न जाने कब 
और कहां
खतम होगा!!!

पटरियां- 2


हम पटरियां ही थे दरअसल
जो कभी न मिले
पर हमेशा साथ चले
और मिलें भी न शायद...

हम हमेशा पास-पास रहे
एक साथ चले, एक साथ मुड़े
पर कभी नहीं तोड़ी मर्यादाएं
नहीं भूलीं अपनी सीमाएं
क्यूंकि...

हमें सबके चेहरे पर 
मुस्कान लानी थी
रूठों को मनाना था
बिछड़ों को मिलाना था
इसलिए...

हम कभी नहीं मिले
पर हम मिलेंगे साथी
जरूर मिलेंगे

क्षितिज के उस पार
जहां न कोई
स्टेशन होगा
न होगी कोई ट्रेन
वहां से न कोई आने वाला होगा 
न कोई जाने वाला होगा
हम वहीं मिलेंगे साथी

पटरियां मिलेंगी
जरूर मिलेंगी!!!

Monday, February 13, 2012

अब नहीं चलेगा कोई बहाना..वोट डालने आपको पड़ेगा जाना!

लखनऊ। इलेक्शन कमीशन ने यूपी में की एक और नई शुरुआत। अब आपका वोट ना करने का वो बहाना भी नहीं चलेगा कि मुझे मेरा पोलिंग बूथ नहीं पता है। अब बूथ की जनकारी होगी आपसे महज एक एसएमएस दूर।

अब आप घर बैठे जान सकते हैं कि आपको वोट करने कहां जाना है वो भी अपने मोबाइल के मदद से। इसके लिए आप ज्यादा कुछ नहीं करना बस एक मैसेज भेजना होगा। इससे पहले चुनाव आयोग ने इस बार की वोटिंग को वेबकैमरों के जरिए ऑनलाइन दिखाने की शुरुआत की थी।

मैसेज में आपको UPEPIC टाइप करना होगा फिर एक स्पेस देना होगा और इसके बाद अपना मतदाता फोटो पहचान पत्र संख्या टाइप करना होगा। फिर मैसेज को 9212357123 पर भेज देना होगा। 

मैसेज डिलीवर होने के कुछ सेकंड बाद ही आपको एक मैसेज मिलेगा जिसमें आपके पोलिंग बूथ संबंधी सभी जानकारी दी गई होगी।

Type (space)

Example "UPEPIC XYZ1234567"

Send it to 9212357123.



http://www.bhaskar.com/article/UP-OTH-no-excuse-to-vote-2857395.html

Monday, September 5, 2011

शिक्षक दिवस का बदलता स्वरूप : टीचर्स डे


5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस। यह दिन हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाता है जो एक महान शिक्षक के साथ-साथ राजनीतिज्ञ एवं दार्शनिक भी थे। उस महान व्यक्तित्व को पूरी दुनिया डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जानती है। शिक्षक के रूप में उनकी प्रसिद्धि के कारण ही उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि एक बार उनके मित्रों और शिष्यों ने उनका जन्मदिन मनाने का आग्रह किया तो उन्होंने उसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का सुझाव दिया तभी से हर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता रहा है। स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति तथा दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर सन् 1888 को दक्षिण भारत में चेन्नई से 40 मील उत्तर-पूर्व में तिरूतनी नामक स्थान पर हुआ था। इनका बचपन तिरूतनी और तिरूपती जैसे धार्मिक स्थानों पर बीता। वे आर्थिक रूप से बहुत कमजोर परिवार से थे। यहां तक कि परिवार का भरण-पोषण करना भी कठिन था। लेकिन इसके बावजूद अपने बच्चे की विलक्षण प्रतिभा को देखकर राधाकृष्णन के पिता ने उन्हें पढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास किया। राधाकृष्णन की आरंभिक शिक्षा तिरूवल्लुर के गौड़ी स्कूल और तिरूपति मिशन स्कूल में हुई। इसके बाद में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से उन्होंने पढाई पूरी की। इन्होने कला में स्नातक तथा परास्नातक की उपाधि मद्रास विश्वविद्यालय से प्राप्त की।

डॉ. राधाकृष्णन बेहद जिज्ञासु स्वभाव के थे इसलिए बिना तार्किक स्पष्टता के किसी बात को स्वीकार करना उनके स्वभाव में नहीं था, दर्शन शास्त्र शुरू से ही उनका सबसे प्रिय विषय रहा। आश्चर्य की बात तो यह है कि जब वे कॉलेज में ही थे उस दौरान वे हिन्दू दर्शन से जुड़े शास्त्रीय ग्रंथों के साथ नामचीन दर्शन-शास्त्रीयों के व्याख्यानों की व्याख्या कर सकते थे। जब वे एम.ए. की पढ़ाई पूरी कर रहे थे, तो उसी समय उनकी पहली किताब ‘द एथिक्स ऑफ द वेदांत एंड इट्स मैटीरियल प्रीसपोजिशन’ प्रकाशित हुई। इस किताब के प्रकाशन के बाद ही लोग उनकी प्रतिभा के कायल हो गए। इसके बाद उनकी जितनी भी रचनाएं प्रकाशित हुईं सब हाथों-हाथ ली गईं। उनकी रचनाएं न केवल अलग-अलग धर्मदर्शनों से जुड़ी हैं, बल्कि वे किताबें उन धर्म क्षेत्रों में एक कीर्तिमान बन चुकी है। अप्रैल 1909 में राधाकृष्णन की नियुक्ति मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज के दर्शनशास्त्र विभाग में हुई। इसके साथ ही साथ इन्होंने भारतीय धर्म तथा दर्शन का गंभीर अध्ययन जारी रखा और दर्शन के एक ख्याति प्राप्त अध्यापक बने। सन् 1918 में डॉ. राधाकृष्णन मैसूर विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। तीन वर्ष पश्चात् उनकी नियुक्ति भारत के सबसे महत्वपूर्ण दर्शनशास्त्र के पद पर किंग जार्ज पंचम मानसिक तथा चारित्रिक विज्ञान कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई। डॉ. राधाकृष्णन ने ब्रिटिश साम्राज्य के समय विश्वविद्यालीय सम्मेलन के दौरान जून 1926 में तथा सितंबर 1926 में हावर्ड विश्वविद्यालय में हावर्ड विश्वविद्यालय में अन्तर्राश्ट्रीय दर्शनशास्त्र सम्मेलन में कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिध्त्व किया। सन् 1929 में डॉ. राधाकृष्णन को ऑक्सफोर्ड के मैनचेस्टर कॉलेज के प्रिंसिपल जे. इस्टिन कारपेंटर ने अध्यापन के लिए आमंत्रित किया। सन् 1936 से 1939 तक डॉ. राधाकृष्णन ऑक्सफोर्ड के विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्म तथा नीतिशास्त्र संबंधों के प्रोफेसर रहे। सन् 1939 में ये ब्रिटिश एकेडमी के फेलो चुने गए। सन् 1939-48 तक ये बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। इसके बाद इन्होंने भारत के राष्ट्रीय व अनतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। सन् 1946-52 तक ये यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि दल के नेता रहे। ये सोवियत संघ में 1949-52 तक भारत के राजदूत रहे, 1952-62 तक भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति रहे तथा 1952 से 54 तक यूनेस्को की सामान्य सभा के अध्यक्ष रहे। इसी दौरान सन् 1954 में उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। इन्होंने सन् 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति का पदभार भी संभाला। सन् 1962 में डॉ. राधाकृष्णन भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पश्चात् राष्ट्पति बने तथा मई 1962 से मई 1967 तक अपना कार्यकाल पूरा किया।

डॉ. राधा कृष्णन का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि वे धुर-विरोधियों को भी अपना कायल बना लेते थे। जब वे सोवियत संघ के राजदूत थे तो लोगों को हैरानी होती थी कि एक दर्शनशास्त्री एक कट्टर कम्युनिस्ट स्टालिन को कैसे प्रभावित कर सकता है। पर सच तो यह है कि राधाकृष्णन की जीवनदृष्टि के सामने स्टालिन नतमस्तक हो गए थे। राधाकृष्णन से मुलाकात के बाद स्टालिन उनके बहुत बड़े प्रशंसक हो गए। वे हमेशा कहा करते थे कि यदि भारत में मैं किसी से मिलना चाहूंगा, तो वे राधाकृष्णन ही होंगे, क्योंकि जब भी मैं उनसे मिलता हूं, तो ऐसा लगता है कि मैं भारत से बात कर रहा हूं। राधाकृष्णन के जन्म के समय उनके परिवार में किसी ने यह नहीं सोचा था कि भौतिकता से दूर उस परिवार में जन्मा बालक एक दिन अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर विश्वमंच पर भारत देश का प्रतिनिधित्व करेगा।

डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी प्रतिभा से सबको चौंका दिया, और एक शिक्षक के रूप में अज्ञानता का अंधेरा हटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने के प्रति हमेशा समर्पित रहे। आज उनके जन्म को 123 वर्ष बीत चुके हैं, आज हर क्षेत्र में भौतिकता हावी है। शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा है, वह भी अब व्यवसाय बन चुका है। आज पैसा इस कदर हावी हो चुका है कि शिक्षकों की भी प्राथमिकता ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना बन चुकी है। इस समय तमाम ऐसे शिक्षक हैं जो एक साथ कई-कई स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में पढा रहे हैं। कई ऐसे शिक्षक भी हैं जो पद प्राप्ति और पदोन्नति के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। शिक्षकों के बहुत से ऐसे उदाहरण भी हैं जो शिक्षक जैसे सम्मानित पद को शर्मसार कर रहे हैं, ऐसे में इन शिक्षकों को भी नैतिकता का मूल्य पढ़ाने की आवश्यकता है। शिक्षा क्षेत्र में शिक्षक के रूप में डॉ. राधाकृष्णन ने जो प्रतिमूर्ति स्थापित की थी उन्हें ये शिक्षक धूलधूसित कर रहे हैं।

राधाकृष्णन ने अपना जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि भौतिकता की आंधी में शिक्षक दिवस तब्दील होकर ‘टीचर्स डे’ हो जाएगा। समाचार पत्रों को छोड़ दें तो कुछ ही आयोजन डॉ. राधाकृष्णन के सम्मान में होता है, जिससे छात्र उनके बारे में जान सकें। आज के छात्रों की नजर में ‘टीचर्स डे’ टीचरों को खुश करने का दिन होता है, उन्हें पुरस्कार और कार्ड भेंट किये जाते हैं, बस ऐसे ही मनाया जाता है आधुनिक ‘शिक्षक दिवस’। लेकिन भारत को जरूरत है फिर से राधाकृष्णन की सोच के बारे में जानने की कि आखिर क्यों उन्होंने अपना जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के लिए कहा था। वे चाहते थे कि इस दिन अच्छे शिक्षकों का सम्मानित किया जाए और शिक्षकों को उनके उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरुक किया जाए, क्योंकि देश के विकास के लिए बेहतर शिक्षा सबसे जरूरी कारक है। तो आइये इस शिक्षक दिवस पर शिक्षकों से अनुरोध करते हैं कि देश के विकास के लिए वे अपने उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों का निर्वाहन पूरी ईमानदारी से करें और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सपनों को साकार करें।

- कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह

Monday, December 13, 2010

अभी दिल्ली है दूर......

बहुत पहले सोचा था कभी
कि 'वो' मिलेगी जब, तो...
खुल के जियेंगे सभी

'वो' मिल तो गई, लेकिन
जो सोचा था वो मेरा न हुआ
एक अध्याय बाकी है अभी
जो पूरा न हुआ

पूछो जो मन से तो यही आवाज आती है
अभी तो पूरी जिंदगी बाकी है।
'वो' जाम है तो क्या
तू भी तो साकी है।

उसने मिलते ही एक बात कही थी
वो बात अक्सर याद आती है

कि, मत होना मेरे मिलने के मद में चूर....
क्योंकि,
मैं तो हूं महज एक शुरूआत, अभी दिल्ली है दूर......।

Thursday, October 21, 2010

आम आदमी के पैसे पर राजनीति


राष्ट्कुल खेलों की तैयारी और आयोजन के दौरान हुई अनियमितताओं की जांच में पूरा का पूरा सरकारी अमला दोषियों को बचाने में लगा है ऐसा साफ जाहिर हो रहा है ।पूरे प्रकरण ने राजनैतिक रूप ले लिया है इस बात की पुष्टी सिर्फ इसी बात से हो जाती है कि सबसे पहला छापा भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधांशु मित्तल के घर एवं कार्यालय पर मारा गया है। जबकि भारत के बच्चों से भी पुंछा जाय तो वे सुरेश कलमाणी का नाम लेंगे। इस बात की पुष्टी आयोजन के उद्घाटन समारोह में उनके व्यक्तव्य के समय हुई हूटिंग से ही हो गयी थी जो भारत की आम जनता द्वारा की गयी थी।यह वही आम जनता थी जिसके पैसे से ये खेल आयोजित हुआ था।

भारत की जनता बहुत ही आसानी से सबकुछ भूल जाती है,कॉमनवेल्थ गेम्स की चकाचौंध में वह अपने पेट की भूख भी भूल गयी,वह भूल गयी की मंहगाई ने उसकी कमर तोड रखी है।भारत की इस भूलने की प्रकृति के जिम्मेदार कुछ मायने में मीडिया भी है,क्यूँकि वह भी टी आर पी और प्रसार संख्या के भंवर में ऐसा फंसे हैं कि उन्हें आम आदमी की समस्यायें दिखाई ही नहीं देतीं।

Wednesday, April 28, 2010

पटरियां

हम पटरियां है दरअसल
जो कभी नहीं मिलतीं
पर हमेशा साथ-साथ ही चलती हैं।
यही उनकी नियति बन चुकी है
कि
साथ होके भी बहुत दूर रहना है।
वो मिलना भी बहुत चाहती हैं ;
दूर से लोगों को
मिलती हुई महसूस भी होती हैं
पर चाहकर भी वो
नहीं छू सकती हैं एक दूसरे को
क्यूंकि
वो जानती हैं ,कि
जिस दिन उन दोनों ने
अपनी ख़ुशी के लिए
एक दूसरे को छुआ
उनके सहारे दौड़ने वाली रेलगाड़ी
जो बहुतों को अपनों से मिलाती है
बिछड़ों का दीदार कराती है ;
चारों खाने चित्त हो जायेगी
jiske liye उन दोनों ने इतना कष्ट उठाया है
वो लक्ष्य एकाएक मिटटी में मिल जायेगा
यही सोचकर
दोनों पटरियां
अपना कर्तव्य निभाते हुए
जीवन बिताती रहती हैं।
और ऐसा करते हुए
दोनों पटरियां
जीवन भर साथ ही रहती हैं
पर एक भी पल को मिल नहीं पाती हैं।

Tuesday, April 27, 2010

बल्ब

बल्ब अंधियारे कोने को रोशन करता है
पर किसी से कुछ भी तो नहीं कहता है
क्या,किसी ने कभी सोचा होगा कि
उसे वो अँधेरा कोना जगमगाने के लिए
कितना तपना पड़ता है
पर फिर भी वह
उफ़ तक भी नहीं करता है , और
किसी से कुछ भी तो नहीं कहता है
क्यूंकि
वो बल्ब है
और उसे अँधियारा मिटाना है
ता उम्र तपते ही जाना है
जब तक
किसी अंधियारी रात
अंधियारे कोने के अँधेरे से
लड़ते - लड़ते
बलिदान न हो जाये
उसी अंधियारे में कहीं खो न जाये

Tuesday, February 2, 2010

जनसत्ता को जनसत्ता ही रहने दो कोई और नाम न दो

कभी-कभी कुछ ऐसी घटनायें भी इन्सान के जीवन में घटती हैं जिससे लगता है की इन्सान के मन में ऐसे ही कोई बात या विचार नहीं आता उसका कोई न कोई पक्ष जरुर सार्थक जीवन से जुड़ा होता है।

ऐसा ही कुछ आज शाम मेरे साथ हुआ जब मेरे समाचार विक्रेता ने आज ११ नवम्बर २००९ का जनसत्ता मेरे कमरे के मुख्य गेट के नीचे बनी खुली जगह से सरकाया। उस वक़्त मै खाली तो नहीं बैठा था लेकिन मन में जनसत्ता का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से था (यह ठीक उसी प्रकार था जैसा युवा मन अपने प्रेमी या उसके सन्देश का करता है)।
लेकिन आज यह क्या हुआ जैसे ही पत्र का आधा हिस्सा सरक कर अंदर हुआ मुझे विश्वास ही नहीं हुआ मुझे लगा आज कोई और समाचारपत्र दे रहा है , पर जब पत्र का आखिरी सिरा अंदर प्रवेश किया और पत्र के मास्टर हेड पर जनसत्ता लिखा देखा तो धक्का लगा। कुछ पल खोये रहने के बाद याद आया कि अचानक ही ५ नवम्बर कि रात को जनसत्ता के संस्थापक संपादक रहे प्रभाष जोशी जी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो चुका है, और उसी दिन कई जगह यह चर्चा आम थी कि २६ साल तक जनसत्ता पत्रकारिता के जिस शिखर पर था अब उसे भले ही धीरे-धीरे ही सही पर वहां से उतरना होगा।
इस प्रक्रिया कि इतनी तेज़ शुरुआत की मुझे भी आशा नहीं थी और मुझे लगता है कि आज इस पत्र के सभी पाठकों को एक घोर निराशा से दो चार होना पड़ा होगा। आज मुख्य पृष्ठ पर यूनियन बैंक का पूर्ण पृष्ठीय विज्ञापन है। जिसे देखकर अचंभा होता है कि, धन की खातिर प्रयोग की आंड में जनसत्ता भी ऐसा कर सकता है। अब आगे भी हो सकता है कि जनसत्ता ऐसे कई प्रयोगधर्मी झटके देता रहे, क्यूंकि अब हमारे जोशी जी नहीं रहे।
जोशी जी ने पूरे जीवनकाल में पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया और यह प्रदर्शित किया कि समाचार पत्रों में समाचार प्रमुख हैं विज्ञापन नहीं किन्तु उनके हमारे बीच से जाने के तुरन्त बाद ही जनसत्ता द्वारा ऐसा कदम उठाना बहुत ही कष्टकारक है।
सभी जानते हैं कि विज्ञापन समाचार पत्रों कि जान होते हैं,लेकिन ऐसे जीवन से क्या लाभ जो आत्म सम्मान कि बलि देकर मिला हो।
क्या जोशी जी जीवित होते तो ऐसा होता,मुझे तो नहीं लगता पर जोशी जी की आत्मा यदि कहीं होगी तो आज जनसत्ता का २६ वर्षीय ३५७ वां अंक देखकर जरुर विचलित हो गयी होगी।
अतः मेरा जनसत्ता के प्रबंधन वर्ग से निवेदन है कि "जनसत्ता को जनसत्ता ही रहने दो कोई और नाम दो "।
(यह व्यथित पंक्तियाँ मेरे द्वारा ११ नवम्बर को लिखी गयीं थी पर कुछ कारणवश इसे आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सका इसके लिए क्षमा कीजियेगा,हो सकता है मेरी बातें कुछ लोगों को अच्छी न लगे तो मै यहाँ कहना चाहूँगा कि यह मेरी व्यक्तिगत राय है पर भी अगर बुरी लगे तो क्षमा कीजियेगा)

Friday, May 15, 2009

इस देश को फ़िर से सोने की चिडिया बनायें हम


कल रात जब मै अँधेरी बस्ती से गुजर रहा था ,
आदमी गर्मी में मर रहा था ,
ये देख मुझे बस इक बात थी याद आयी
जो है हमारे देश की जग हंसाई।
कि , नींद मखमल के बिस्तर पे आती किसी को नहीं ,
और कोई मरता है दो गज कफ़न के लिये॥
हम सोते हैं कूलर में ,कमरे में ,बिस्तर पर ,
उन्हें क्यूँ नींद आ जाती है ईंटों पर ।
आख़िर कब आयेगा इस देश में वह दिन
जब सबके पास अपना घर होगा ,सबकी समान शिक्षा होगी ।
आख़िर कब तक यहाँ सिर्फ़ सीता ही दोषी बनायी जायेगी ,
आख़िर कब तक यहाँ मोहब्बत सूली पर चढाई जायेगी ।
आख़िर कब तक देश के नौनिहालों को अंग्रेजी शिक्षा दिलाई जायेगी,
आख़िर कब तक ......
आओ आज इस परम्परा से निजात पायें हम,
इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनायें हम॥
आख़िर कब तक यहाँ बुद्ध मुस्कुरायेंगे
आख़िर कब तक यहाँ धर्म आग लगायेंगे
आख़िर कबतक यहाँ खून की होली होगी, वोटों की बोली होगी,
आख़िर कब तक ......
आओ आज सबको गले लगायें हम ,
इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनायें हम॥
आख़िर कब तक यहाँ इंडिया आगे बढ़ता रहेगा!
आओ भारत को आज आगे बढायें हम, भारतीयता की ज्योति जलायें हम,
इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनायें हम
आओ एक कदम और आगे बढायें हम ,
इस देश को फ़िर से सोने की चिडिया बनायें हम ,
इस देश को फ़िर से सोने की चिडिया बनायें हम॥

Monday, May 4, 2009

"लखनऊ की महफिलों में हैं शादियाँ लगातार, सड़को पर रहती है ट्रैफिक की भरमार.."

शादी सीजन होने की वजह से चारों तरफ़ शोर शराबा, धूम, धडाका, खुशियाँ है। सब कुछ है लखनऊ की सडको पर लेकिन इसी के साथ यहाँ गाड़ियों की भरमार भी है। जिससे हर तरफ, हर गली में जाम लगातार बना रहता है।
इस जाम के पीछे वजह सिर्फ़ एक है- अवध की शानो शौकत जो पुश्तों दर पुश्तों आज भी हमारी रग-रग में काबिज है। हम नवाबी शहर के बाशिंदे हैं तो भला कहीं ऐसा हो सकता है की हम किसी पार्टी में जाए और बिना साजो सामान के चले जायें। हमारी इसी फितरत की वजह से ही तो चारों ओर गाड़ियों के हार्न चिघाड़ा करते हैं और आम आदमी उसी में मरता रहता है। गाड़ी बड़ी हो या छोटी जल्दी सबको होती है और तो और गाड़ियों में बैठे रहते हैं बस दो या तीन लोग जबकि उसमें आराम से चार पॉँच लोग बैठ सकते हैं।
अब वह समय आ गया है की हमें इस बात का ध्यान कर लेना चाहिए की अवध अब लखनऊ हो गया है और हमें इसके विकास में हर सम्भव प्रयास करना चाहिए, जिसके लिए ट्रैफिक का सुचारू रूप से चलना बहुत जरूरी है। हमें अपने जिंदगी के दो मिनट बचाने के लिए प्राइवेट साधन का इस्तेमाल न करके पब्लिक साधन का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सड़को पर कम से कम भीड़ हो और ट्रैफिक ठीक से चल सके, जिससे हमारे शहर और देश की प्रगति हो।

Wednesday, January 7, 2009

एक संदेश दोस्तों के नाम

नमस्कार दोस्तों आप लोगो की ब्लॉग की सफलता को देख कर मुझे भी अपनी सोच को अब विस्तार देने का मार्ग मिल गया हैं। आप लोगो का साथ मिलेगा ऐसी उम्मीद करता हूँ।


आपका कौशलेन्द्र