Wednesday, April 28, 2010

पटरियां

हम पटरियां है दरअसल
जो कभी नहीं मिलतीं
पर हमेशा साथ-साथ ही चलती हैं।
यही उनकी नियति बन चुकी है
कि
साथ होके भी बहुत दूर रहना है।
वो मिलना भी बहुत चाहती हैं ;
दूर से लोगों को
मिलती हुई महसूस भी होती हैं
पर चाहकर भी वो
नहीं छू सकती हैं एक दूसरे को
क्यूंकि
वो जानती हैं ,कि
जिस दिन उन दोनों ने
अपनी ख़ुशी के लिए
एक दूसरे को छुआ
उनके सहारे दौड़ने वाली रेलगाड़ी
जो बहुतों को अपनों से मिलाती है
बिछड़ों का दीदार कराती है ;
चारों खाने चित्त हो जायेगी
jiske liye उन दोनों ने इतना कष्ट उठाया है
वो लक्ष्य एकाएक मिटटी में मिल जायेगा
यही सोचकर
दोनों पटरियां
अपना कर्तव्य निभाते हुए
जीवन बिताती रहती हैं।
और ऐसा करते हुए
दोनों पटरियां
जीवन भर साथ ही रहती हैं
पर एक भी पल को मिल नहीं पाती हैं।

Tuesday, April 27, 2010

बल्ब

बल्ब अंधियारे कोने को रोशन करता है
पर किसी से कुछ भी तो नहीं कहता है
क्या,किसी ने कभी सोचा होगा कि
उसे वो अँधेरा कोना जगमगाने के लिए
कितना तपना पड़ता है
पर फिर भी वह
उफ़ तक भी नहीं करता है , और
किसी से कुछ भी तो नहीं कहता है
क्यूंकि
वो बल्ब है
और उसे अँधियारा मिटाना है
ता उम्र तपते ही जाना है
जब तक
किसी अंधियारी रात
अंधियारे कोने के अँधेरे से
लड़ते - लड़ते
बलिदान न हो जाये
उसी अंधियारे में कहीं खो न जाये