Monday, December 13, 2010
अभी दिल्ली है दूर......
कि 'वो' मिलेगी जब, तो...
खुल के जियेंगे सभी
'वो' मिल तो गई, लेकिन
जो सोचा था वो मेरा न हुआ
एक अध्याय बाकी है अभी
जो पूरा न हुआ
पूछो जो मन से तो यही आवाज आती है
अभी तो पूरी जिंदगी बाकी है।
'वो' जाम है तो क्या
तू भी तो साकी है।
उसने मिलते ही एक बात कही थी
वो बात अक्सर याद आती है
कि, मत होना मेरे मिलने के मद में चूर....
क्योंकि,
मैं तो हूं महज एक शुरूआत, अभी दिल्ली है दूर......।
Thursday, October 21, 2010
आम आदमी के पैसे पर राजनीति

राष्ट्कुल खेलों की तैयारी और आयोजन के दौरान हुई अनियमितताओं की जांच में पूरा का पूरा सरकारी अमला दोषियों को बचाने में लगा है ऐसा साफ जाहिर हो रहा है ।पूरे प्रकरण ने राजनैतिक रूप ले लिया है इस बात की पुष्टी सिर्फ इसी बात से हो जाती है कि सबसे पहला छापा भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधांशु मित्तल के घर एवं कार्यालय पर मारा गया है। जबकि भारत के बच्चों से भी पुंछा जाय तो वे सुरेश कलमाणी का नाम लेंगे। इस बात की पुष्टी आयोजन के उद्घाटन समारोह में उनके व्यक्तव्य के समय हुई हूटिंग से ही हो गयी थी जो भारत की आम जनता द्वारा की गयी थी।यह वही आम जनता थी जिसके पैसे से ये खेल आयोजित हुआ था।
भारत की जनता बहुत ही आसानी से सबकुछ भूल जाती है,कॉमनवेल्थ गेम्स की चकाचौंध में वह अपने पेट की भूख भी भूल गयी,वह भूल गयी की मंहगाई ने उसकी कमर तोड रखी है।भारत की इस भूलने की प्रकृति के जिम्मेदार कुछ मायने में मीडिया भी है,क्यूँकि वह भी टी आर पी और प्रसार संख्या के भंवर में ऐसा फंसे हैं कि उन्हें आम आदमी की समस्यायें दिखाई ही नहीं देतीं।
Wednesday, April 28, 2010
पटरियां
जो कभी नहीं मिलतीं
पर हमेशा साथ-साथ ही चलती हैं।
यही उनकी नियति बन चुकी है
कि
साथ होके भी बहुत दूर रहना है।
वो मिलना भी बहुत चाहती हैं ;
दूर से लोगों को
मिलती हुई महसूस भी होती हैं
पर चाहकर भी वो
नहीं छू सकती हैं एक दूसरे को
क्यूंकि
वो जानती हैं ,कि
जिस दिन उन दोनों ने
अपनी ख़ुशी के लिए
एक दूसरे को छुआ
उनके सहारे दौड़ने वाली रेलगाड़ी
जो बहुतों को अपनों से मिलाती है
बिछड़ों का दीदार कराती है ;
चारों खाने चित्त हो जायेगी
यही सोचकर
दोनों पटरियां
अपना कर्तव्य निभाते हुए
जीवन बिताती रहती हैं।
और ऐसा करते हुए
दोनों पटरियां
जीवन भर साथ ही रहती हैं
पर एक भी पल को मिल नहीं पाती हैं।
Tuesday, April 27, 2010
बल्ब
पर किसी से कुछ भी तो नहीं कहता है
क्या,किसी ने कभी सोचा होगा कि
उसे वो अँधेरा कोना जगमगाने के लिए
कितना तपना पड़ता है
पर फिर भी वह
उफ़ तक भी नहीं करता है , और
किसी से कुछ भी तो नहीं कहता है
क्यूंकि
वो बल्ब है
और उसे अँधियारा मिटाना है
ता उम्र तपते ही जाना है
जब तक
किसी अंधियारी रात
अंधियारे कोने के अँधेरे से
लड़ते - लड़ते
बलिदान न हो जाये
उसी अंधियारे में कहीं खो न जाये
Tuesday, February 2, 2010
जनसत्ता को जनसत्ता ही रहने दो कोई और नाम न दो
ऐसा ही कुछ आज शाम मेरे साथ हुआ जब मेरे समाचार विक्रेता ने आज ११ नवम्बर २००९ का जनसत्ता मेरे कमरे के मुख्य गेट के नीचे बनी खुली जगह से सरकाया। उस वक़्त मै खाली तो नहीं बैठा था लेकिन मन में जनसत्ता का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से था (यह ठीक उसी प्रकार था जैसा युवा मन अपने प्रेमी या उसके सन्देश का करता है)।
लेकिन आज यह क्या हुआ जैसे ही पत्र का आधा हिस्सा सरक कर अंदर हुआ मुझे विश्वास ही नहीं हुआ मुझे लगा आज कोई और समाचारपत्र दे रहा है , पर जब पत्र का आखिरी सिरा अंदर प्रवेश किया और पत्र के मास्टर हेड पर जनसत्ता लिखा देखा तो धक्का लगा। कुछ पल खोये रहने के बाद याद आया कि अचानक ही ५ नवम्बर कि रात को जनसत्ता के संस्थापक संपादक रहे प्रभाष जोशी जी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो चुका है, और उसी दिन कई जगह यह चर्चा आम थी कि २६ साल तक जनसत्ता पत्रकारिता के जिस शिखर पर था अब उसे भले ही धीरे-धीरे ही सही पर वहां से उतरना होगा।
इस प्रक्रिया कि इतनी तेज़ शुरुआत की मुझे भी आशा नहीं थी और मुझे लगता है कि आज इस पत्र के सभी पाठकों को एक घोर निराशा से दो चार होना पड़ा होगा। आज मुख्य पृष्ठ पर यूनियन बैंक का पूर्ण पृष्ठीय विज्ञापन है। जिसे देखकर अचंभा होता है कि, धन की खातिर प्रयोग की आंड में जनसत्ता भी ऐसा कर सकता है। अब आगे भी हो सकता है कि जनसत्ता ऐसे कई प्रयोगधर्मी झटके देता रहे, क्यूंकि अब हमारे जोशी जी नहीं रहे।
जोशी जी ने पूरे जीवनकाल में पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया और यह प्रदर्शित किया कि समाचार पत्रों में समाचार प्रमुख हैं विज्ञापन नहीं किन्तु उनके हमारे बीच से जाने के तुरन्त बाद ही जनसत्ता द्वारा ऐसा कदम उठाना बहुत ही कष्टकारक है।
सभी जानते हैं कि विज्ञापन समाचार पत्रों कि जान होते हैं,लेकिन ऐसे जीवन से क्या लाभ जो आत्म सम्मान कि बलि देकर मिला हो।
क्या जोशी जी जीवित होते तो ऐसा होता,मुझे तो नहीं लगता पर जोशी जी की आत्मा यदि कहीं होगी तो आज जनसत्ता का २६ वर्षीय ३५७ वां अंक देखकर जरुर विचलित हो गयी होगी।
अतः मेरा जनसत्ता के प्रबंधन वर्ग से निवेदन है कि "जनसत्ता को जनसत्ता ही रहने दो कोई और नाम न दो "।
(यह व्यथित पंक्तियाँ मेरे द्वारा ११ नवम्बर को लिखी गयीं थी पर कुछ कारणवश इसे आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सका इसके लिए क्षमा कीजियेगा,हो सकता है मेरी बातें कुछ लोगों को अच्छी न लगे तो मै यहाँ कहना चाहूँगा कि यह मेरी व्यक्तिगत राय है पर भी अगर बुरी लगे तो क्षमा कीजियेगा)
Friday, May 15, 2009
इस देश को फ़िर से सोने की चिडिया बनायें हम

आदमी गर्मी में मर रहा था ,
ये देख मुझे बस इक बात थी याद आयी
जो है हमारे देश की जग हंसाई।
कि , नींद मखमल के बिस्तर पे आती किसी को नहीं ,
और कोई मरता है दो गज कफ़न के लिये॥
हम सोते हैं कूलर में ,कमरे में ,बिस्तर पर ,
उन्हें क्यूँ नींद आ जाती है ईंटों पर ।
आख़िर कब आयेगा इस देश में वह दिन
जब सबके पास अपना घर होगा ,सबकी समान शिक्षा होगी ।
आख़िर कब तक यहाँ सिर्फ़ सीता ही दोषी बनायी जायेगी ,
आख़िर कब तक यहाँ मोहब्बत सूली पर चढाई जायेगी ।
आख़िर कब तक देश के नौनिहालों को अंग्रेजी शिक्षा दिलाई जायेगी,
आख़िर कब तक ......
आओ आज इस परम्परा से निजात पायें हम,
इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनायें हम॥
आख़िर कब तक यहाँ बुद्ध मुस्कुरायेंगे
आख़िर कब तक यहाँ धर्म आग लगायेंगे
आख़िर कबतक यहाँ खून की होली होगी, वोटों की बोली होगी,
आख़िर कब तक ......
आओ आज सबको गले लगायें हम ,
इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनायें हम॥
आख़िर कब तक यहाँ इंडिया आगे बढ़ता रहेगा!
आओ भारत को आज आगे बढायें हम, भारतीयता की ज्योति जलायें हम,
इस देश को फिर से सोने की चिड़िया बनायें हम
आओ एक कदम और आगे बढायें हम ,
इस देश को फ़िर से सोने की चिडिया बनायें हम ,
इस देश को फ़िर से सोने की चिडिया बनायें हम॥
Monday, May 4, 2009
"लखनऊ की महफिलों में हैं शादियाँ लगातार, सड़को पर रहती है ट्रैफिक की भरमार.."
शादी सीजन होने की वजह से चारों तरफ़ शोर शराबा, धूम, धडाका, खुशियाँ है। सब कुछ है लखनऊ की सडको पर लेकिन इसी के साथ यहाँ गाड़ियों की भरमार भी है। जिससे हर तरफ, हर गली में जाम लगातार बना रहता है।